Thursday, January 7, 2016

शिकायत है, ज़माने से नहीं अपने आपसे



मै रात भर अपने बगीचे में आंखे खोले नीले गगन में तारो की बारात देखा करती.बगीचे के फूलो की भीनी भीनी मंद सुगंध मेरे अंदर अजीब मस्ती भर देती .इस बीच पता नहीं चलता कब नींद धीरे धीरे मेरी पलको पर आकार बैठ जाती और मुझे अपने आगोश में ले लेती. सुबह जब आँख खोलती तो सूरज की लालिमा आकाश में फैली होती ,बगीचे के पौधों की पत्तिया ओंस की बूंदों के वजन से सर नवाए होती तथा पक्षी अपना कलरव गान कर रहे होते. ये दृश्य इतने रमणीक और ह्रदयग्राही होते की मेरी अत्मा में बस जाते और मेरी आत्मा से एक हूक निकलती आहा! दुनिया कितनी सुन्दर है.इन मनोहारी छटाओं को देखकर ज़िन्दगी पर्वतो की चोटियो को चूमना चाहती,आजाद पंछी की तरह असमान में उड़ना चाहती , नदी की तरह पूरी दुनिया को पैदल चलकर नापना चाहती.

लेकिन आज ज़िन्दगी सिकुड़कर इतनी छोटी हो गयी है कि लगता है जैसे किसी पिंजड़े में बंद हो. अब हर शाम दिन के लम्हो का गुणा भाग करने में और अगले दिन शायद कुछ बेहतर हो पाने की उम्मीद के साथ आती है तथा हर सुबह जीवन की जटिलता का नया रूप लेकर आती है. इस तरह जीना एक आदत बन गया है .लगने लगा है कि ज़िन्दगी एक मुश्किल भरी काली रात के सफ़र में है.दुनिया की इस भीड़ में जहाँ एक को दूसरे का हाल तक जानने कि फुर्सत नहीं है, मै कंही खो गयी हूँ और मुझे अपना ही चेहरा अजनबी नज़र आने लगा है.कभी सोचा नहीं था कि इंसानों के,रिश्ते नातो से भरे इस जंगल से जी ऐसा ऊब जायेगा कि कंही दूर बहुत दूर किसी एकांत में जाकर रहने का मन करेगा. ऐसे एकांत में जिसका विस्तार इतना हो कि जहाँ अतीत से मुझे कोई आवाज न आये, जहाँ मुझे किसी क़ी याद न आए और लब भी सी लूँ ताकि मुंह से उफ़ न आए .

खुशियों क़ी मंजिल ढूढने के लिए संघर्ष क़ी राह पर घर से निकली मगर रात के अँधेरे में रास्ते क़ी खाई को देख न पाई और ओंधे मुंह उसमे गिर पड़ी. बहुत कोशिश के बाद उस खाई से जब बाहर निकली और फिर से सफ़र शुरू किया तो न जाने कब और कैसे रास्ते मुड़ते चले गए और एक ऐसी जगह पहुंचा दिया, जहाँ आने वाले कल से भी कोई उम्मीद नहीं बची.

लेकिन ज़िन्दगी इस अँधेरे क़ी चादर को चीरकर बाहर उजाले में आना चाहती है.उस पिंजड़े को जिसने ज़िन्दगी के दायरे को सिकोड़ दिया है ,को तोड़कर बाहर आना चाहती है और आजाद पंछी क़ी तरह नीले गगन में फिर से गाना चाहती है. मन चाहता है कि इस अँधेरे को चीरता हुआ सफ़ेद फूलो का बगीचा हो जिसमे जुगनू टिमटिमा रहे हो, गगन में चाँद बादलों से आंख मिचोली खेल रहा हो और युगों क़ी लम्बी यात्रा कर मेरी आँखों में लौटी नींद हो.

Wednesday, December 9, 2015

Grow stronger ....


Learn from your mistakes
Grow stronger from the pain
The people who are rouge 
And always used u 
Don't be in pain because of them
It would be wise to get rid of them
Let u be more stronger
So they could not hurt you
And pain will not destroy you.

Wednesday, February 11, 2015

A great love story.



      Have read the great love story of Dostoevsky and his wife Anna. Heart touching story and gave me the feeling of Charlie Chaplin’s film Limelight.
         It is the time when there is an urgent need of such a concept of love. So the youngsters in printed shirt, cooling glass, low waist jeans with earphone in ear could realise the concept of love.  For these ‘modern’  youngsters love is everywhere, it is on internet, over phone, on roads, in malls, in shopping complexes, in PVRn n cinema halls, in schools and colleges and in restaurants but it is far away from their life. One day they love someone, next day they get fade up with that. Their love is very much calculated, it is purely based on the outward appearance or money.
            Love, if taken ethically give strength and creativity and such a relationship can never be fade up. Love which is based on higher morality and ethics gives new life. Dostoevsky and Anna’s lives proved that love can last forever when it is based on values and respecting the qualities of each other. Such a love even do not ended, when one of the two do not alive. When Anna got marry with Dostoevsky, at that time she was young and bright lady and Dostoevsky was a TB patient, a men who was in queer street. Dostoevsky died after 15 years of their marriage at the age of sixty. After his death Anna throughout her life was involved in finishing and publishing the incomplete literature of Dostoevsky. It is she who brought Dostoevsky into limelight  by publishing his work after his death. But she kept herself as an inglorious. Such was their great love.

Monday, December 1, 2014

आधुनिक युग का 'प्रगतिशील' साहित्य



       कुछ समय पहले मैंने NBT द्वारा दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित पुस्तक मेले से पेंगुइन पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशित 'प्रगतिशील' लेखिका जयंती रंगनाथन द्वारा लिखित 'औरतें रोती नहीं' नामक पुस्तक खरीदी। मैंने कभी भी जयंती रंगनाथन को पढ़ा नहीं था, सो किताब का शीर्षक देखकर मैंने उसे खरीद लिया। अब जब समय मिला तो उसे को पढ़ा। इस किताब को पढ़कर मन जितना क्षुब्द हुआ और घृणा से भर गया है, उसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। किताब को लगभग आधी ही पढने के बाद मैंने फाड़कर जला दिया और मन हुआ की जी भर के कै करुँ जिससे जो कुछ पढ़ा है उसे बाहर निकल सकूँ। मैंने जीवन में शायद ही कभी किसी किताब का इतना अपमान किया होगा लेकिन इसे अपने संग्रह में रखना मेरे लिए सम्भव नहीं था। मुझे अभी तक ये मालूम था कि सड़क किनारे बिकने वाला सस्ता सहित्य ही अश्लील होता है। इतने बड़े पब्लिकेशन द्वारा प्रकाशितऔर इतने बड़े पुस्तक मेले से खरीदा गया साहित्य गन्दगी का नंगा रूप हो सकता है, मुझे मालूम नहीं था।

           पिछले कुछ समय में मैंने कुछ 'प्रगतिशील' लेखिकाओं के ब्लॉग भी पढ़े। जिसमे उन्होंने समाज की नंगी कामुकता का चित्रण कर अपने 'खुलेपन' और 'प्रगतिशीलता' का परिचय है। कुत्सित मनोवृत्ति, पशुवृत्ति को चटकारे लेकर लिखना कैसी प्रगतिशीलता है ? समाज जो आज सड़ रहा है, गल रहा है उसकी गन्दगी और सड़ाँध का पाठको को 'आनंद' प्रदान करने के लिए जीवंत वर्णन प्रगतिशीलता नहीं,अश्लीलता है। अगर ईमानदारी से कुत्सित, घ्रडित और वीभत्स जीवन के बारे में लिखना है तो गोर्की से सीखो, जिसने उस दुर्गन्ध पूर्ण जीवन का मार्मिक चित्रण कर पाठको के मन में उसके प्रति घृणा पैदा करने की कोशिश की है ना की 'आनंद' देने की। 
        
      मन्नू भंडारी और अमृता प्रीतम के बाद के 'आधुनिक प्रगतिशील' लेखकों में मैंने शायद ही किसी को पढ़ा होगा। लेकिन अब आकर जिन्हे पढ़ा उनकी 'प्रगतिशील' लेखनी को सड़ा ,गला और दुर्गन्ध पूर्ण पाया। लगता है इस दुर्गन्ध पूर्ण समाज की प्रगतिशीलता भी दुर्गन्ध पूर्ण हो गयी है।

Wednesday, August 6, 2014

महामारी का शिकार

यह सन 2010 की बात है जब दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन किया गया था. खेलों का आयोजन करने के लिए दिल्ली के सौंदर्यीकरण के नाम पर पूरी दिल्ली को खोद डाला गया था. बड़े-बड़े गड्ढे खोदकर बरसात के मौसम में ऐसे ही छोड़ दिए गए थे. जिनमें पानी भरकर डेंगू के मच्छर जमकर पैदा हुए और 2010 के अगस्त व सितंबर के महीने में डेंगू दिल्ली में एक महामारी बन गया. दिल्ली व एनसीआर रीजन में हजारों लोग इस महामारी की चपेट में आ गए और सैकड़ों लोग बिना काल मौत के मुंह में समा गए. उस साल डेंगू की चपेट में आने वाले लोगों में से मैं भी एक थी.
उस समय दिल्ली में जेएनयू में रिसर्च करती थी. अगस्त महीने की एक रात को सही सलामत सोई और सुबह जब उठी तो भयंकर बदन दर्द व तेज बुखार था. बुखार की कुछ दवाइयां मेरे पास रखी हुई थी वह ले ली, लेकिन थोड़ी देर कम रहने के बाद बुखार फिर से तेज हो जाता. पूरा दिन यही क्रम चलता रहा. अगले दिन जब मैने अपने साथियों को बुखार के बारे में बताया तो उन्हें बड़ी चिंता हुई और उन्हें लगा कि कहीं मुझे डेंगू तो नहीं हो गया. तो उन्होंने मुझे दिल्ली के किसी अस्पताल में भर्ती करने की कोशिश की. एम्स, सफदरजंग जैसे बड़े अस्पतालों सहित कई अस्पतालों के धक्के खाने के बाद आखिर वह लोग बङी मुश्किल से मुझे कलावती अस्पताल में भर्ती करने में कामयाब हुए. क्योंकि किसी भी हॉस्पिटल में बेड खाली नहीं था इसलिए कोई भी हॉस्पिटल एडमिट करने के लिए तैयार नहीं था. कलावती पहुंचने पर जब ब्लड टेस्ट हुआ तो प्लेटलेट काउंट 100000 के नीचे आया. डेंगू सस्पेक्ट किया गया इसलिए मुझे भर्ती कर लिया गया. जिस बेड पर मुझे भर्ती किया गया उस पर पहले से ही डेंगू का एक और पेशेंट था. पूरा वार्ड डेंगू पेशेंट से भरा हुआ था और हर बेड पर दो और कुछ पर तीन पेशेंट तक भर्ती थे. खौफनाक मंजर था. भर्ती होने के कुछ घंटे बाद ही मेरे बराबर वाले बेड पर जो एक लगभग 10 साल उम्र का बच्चा भर्ती था, ने डेंगू से दम तोड़ दिया. पूरे हॉस्पिटल का यही हाल था हर घंटे पर कोई ना कोई डेंगू का मरीज दम तोड़ देता था. दिनभर चारों तरफ से हाहाकार, चीत्कार की आवाजें आती रहती.
अगले दिन ही मेरा प्लेटलेट काउंट 100000 से घटकर 40000 पर आ गया. तब मैंने अपने घरवालों को इनफॉर्म किया और वह तुरंत ही बिना विलंब किए दिल्ली पहुंच गए. अब स्थिति यह थी कि हर घंटे पर प्लेटलेट काउंट किया जाता था और वह हर बार ही पहले से कुछ घट कर आता था.
पूरे वार्ड में ऐसी स्थिति में भी कोई सीनियर डॉक्टर नहीं था. पूरे वार्ड को जूनियर रेजिडेंट के भरोसे छोड़ा दिया गया था. मरीजों के तीमारदार पूरा दिन डॉक्टरों के आगे पीछे हाथ जोड़े घूमते रहते कि साहब हमारे मरीज को बचा लो लेकिन मरीजों की तुलना में डॉक्टर इतने कम थे कि वह किसी भी मरीज को सही से ध्यान नहीं दे पाते थे. मुझे भर्ती हुए 3 दिन हो चुके थे और मैं अपने वार्ड में अगल-बगल के बेड से 1 या 2 मरीजों की रोजाना मौत होते हुए देख रही थी. और मुझे बिल्कुल लगने लगा था कि मेरी बारी भी जल्दी ही आने वाली है.
भर्ती होने के चौथे दिन मेरे मसूड़ों नाक व आंखों से खून आना शुरू हो गया. और बेहोशी आनी शुरू हो गई. प्लेटलेट 20000 तक पहुंच चुकी थी. शाम होते-होते स्थिति बेइंतहा खराब हो गई और प्लेटलेट घटकर 5000 पहुंच गइ. पूरी दिल्ली में ढूंढने से भी कहीं ब्लड नहीं मिला जिससे कि मुझे प्लेटलेट चलाया जा सके. मेरे घर वाले भी बदहवास स्थिति में पहुंच चुके थे. ऊपर से डॉक्टरों ने उस समय उनके साथ जो व्यवहार किया उसे वह आज तक नहीं भुला पाए हैं. मैं कुछ बेहोशी की स्थिति में थे लेकिन फिर भी मुझे कुछ आवाज आ रही थी. डॉ मेरे पापा को धमका रहा था कि आपका मरीज नहीं बचेगा इसलिए इसे यहां से ले जाओ हम इसके मरने तक इंतजार नहीं कर सकते क्योंकि हमें यह बेङ किसी दूसरे मरीज को देना है. और मेरे पापा डॉक्टर के आगे गिड़गिड़ा रहे थे कि मेरी बच्ची को बचा लो. मेरे एक साथी के परिचित कलावती हॉस्पिटल में लैब टेक्नीशियन थे. उसने उन परिचित के माध्यम से डॉक्टर को मुझे हॉस्पिटल में ही एडमिट रहने देने पर मजबूर किया. डॉक्टर तो क्या मेरे घर वालों ने भी मेरा जिंदा बचने की उम्मीद छोड़ दी थी. मैं तो बेहोश थी, मेरे घर वालों के लिए वह रात बड़े संकट की रात थी.
लेकिन अगले दिन सुबह मानो जैसे कोई बङा चमत्कार हुआ हो. प्लेटलेट काउंट अपने आप ही 5000 से बढ़कर 7000 पर आ गया. और शाम होते-होते 12000 पर आ गया. और अगले दिन 50000 पर आ गया. इस तरह मेैं जिंदा बच गई.
डेंगू हर साल बरसात के मौसम में भारत जैसे पिछड़े देशों में कहर बरपाता है, लेकिन इसकी आज तक भी कोई दवाई मार्केट में उपलब्ध नहीं है. क्योंकि एक तो यह वैसे ही पिछड़े देशों की बीमारी है दूसरा यह उन लोगों को अपना शिकार बनाती है जो कि मच्छरों द्वारा कटने के लिए आसानी से उपलब्ध हों. क्योंकि इस तबके से फार्मा कंपनी को बड़ा मुनाफा नहीं होगा इसलिए डेंगू की दवाई भी नहीं है. जिस व्यक्ति को डेंगू होता है वह मेरी ही तरह किसी चमत्कार के भरोसे ही जीवित बच पाता है.
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Tuesday, June 10, 2014

वो बहनें, जो अब नहीं रहीं




जो न जानती थीं, हत्या व बलात्कार का मतलब
जिन्होंने न देखे थे पुलिस और थाने
जो पढ़ती थीं स्कूल में और छीलती थीं लहसुन खेत में
आज वो पोस्टमार्टम और फॉरेंसिक जाँच का विषय बन गयी  हैं

वो टहनियाँ जिनसे टपकती थीं पकी-पकी आमियां
झूलती थीं जिन पर वो तीजो के झूले डालकर
वो चुन्नियाँ जो लहराती थीं उनके गले में
आज वो फाँसी की रस्सियाँ बन गयीं हैं

वो अंगूठियां और कड़े जो पहनती थीं हाथ में
वो किताबे और कापियां जिनमे थे कहानी और किस्से
वो खूटियां टंगे है जिन पर उनके नये-नये कपड़े
आज वो जीता जागता इतिहास बन गये  हैं

वो गलियाँ, वो कुएं जहाँ  होती थीं सहेलियों से बातें
वो रास्ते , वो छते जहाँ से देखतीं थीं वो बारातें
वो घर, वो आँगन जहाँ गूंजती थीं उनकी आवाजें
आज वो पुलिस और नेताओं के पर्यटन बन गये हैं

वो वहशी, वो दरिंदे जिन्हे मिली थीं इंसानी जिंदगियां
जिनके लिए अब जीवन का सबब है जेले और काल कोठरियाँ
मगर जिनकी फिक्रमंद है ये राजनीति और सियासत
वो इंसानियत को रौंदकर फांसी के असली हक़दार बन गये हैं

Friday, May 9, 2014

एक वो सुबह



एक सुबह वो आएगी
जब इस दुनिया से
 दौलत की हुकूमत जाएगी
और मेहनत की हुकूमत आएगी
तब दुनिया की मेहनतकश जनता
एक नया सवेरा पायेगी
भौगोलिक सीमाओं में बंधी ये दुनिया
तब एक ही देश बन जाएगी
बिन पुलिस और जेलों के
उस दुनिया की सरकार चलायी जायगी
सब मालिक बन जायेंगे मजदूर न कोई रहेगा
तब कोई अन्नदाता  आत्महत्या करके न मरेगा
जीने के लिए दौलत न जरुरी आवश्यकता होगी
इन्सान के खुशहाल जीवन की बस निश्चितता होगी
हिन्दू और मुस्लमान में बटा इन्सान न रहेगा
इन्सान की तरह जीने के लिए बस एक सभ्य समाज रहेगा
फ़ौज न तोप न बम की जरुरत रह जाएगी
बारूद के ढेर पे बैठी ये दुनिया तब स्वर्ग से भी सुन्दर बन जाएगी 

Tuesday, May 6, 2014

सुन्दर समाज


अँधियारा जग से भाग जाये, जीवन उजियारा हो जाये
आओ मिलकर संघर्ष करें , सुन्दर एक समाज बनायें

भूखा न जहाँ किसी माँ का बच्चा सोये
सड़कों पे जहाँ लावारिश बचपन न रोये

जहाँ जिस्म बेचकर कोई औरत रोटी न कमाये
जहाँ मेहनत की कमाई को सरमायेदार न खाए

ठण्ड से, भूख से जहाँ कोई इंसान न मरे
दौलत के लिए जहाँ भाई भाई का क़त्ल न करे

जहाँ दस्तूर पुराने सदियों के इंसा पर न लादे जाये
जहाँ हया के नाम पे औरत को न मारा जाये

जहाँ प्रेम पर न समाज का पहरा  हो
जहाँ मानव का मानव से रिश्ता गहरा हो

चारों  और बस पात हरे हो, फूल खिले हो
और इन्सान के जीवन में आयी खुशहाली हो

Thursday, June 28, 2012

रास्ता .....


घर तुम्हारे बिना दीवारों की एक इमारत बन गया है
हर्ष और उल्लास तो मानो सामान बांधकर कंही चला गया है
एक हँसता हुआ चेहरा अब कही दिखाई नहीं देता है
एक रोबदार आवाज अब कही सुनाई नहीं देती है


अब तुम घर के दरवाजे पर खड़े, मेरे आने का इंतजार नहीं करते
आँखों से ओझल होने तक ,मुझे हाथ हिला कर विदा नहीं करते
धूल के अद्रश्य दरवाजो को खोलते हुए,तुम मुझे यंहा अकेला छोड़
किसी पहाड़, जंगल या नदी की और चले गए हो
और खुद एक पहाड़ ,नदी या तारा बन गए हो


असहनीय दर्द में भी तुम्हे जीवन में विश्वास था
धीरे धीरे टूटती दीवारों के बीच भी तुम पत्थरों की अमरता खोज लेते थे
जब भी मै तुम्हारे पास आती, तुम अपना सारा दुःख छिपा लेते थे
साडी लड़ाई तुम लड़ते थे ,लकिन जीतती सिर्फ मै थी


तुम्हारे कमरे की हर चीज़ ,हर कोना,
तुम्हारे साथ बिताये वक़्त की मुझे याद दिलाता है
तुम्हारी किताबे, कपडे,और दवाइयों की ख़ाली शीशिया तक
तुम्हारे आसपास होने का मुझे अहसास दिलाते है
बेलो से लेकर बगीचे का हर पौधा,आँगन में खड़ा पेड़ तक
घर के दरवाजे से लेकर,घर की सीढ़िया और आँगन तक
हर वस्तु तुम्हारे वापस आने का रोज मेरे साथ इंतजार करती है
और तुम्हारे न आने पर वे सब भी मेरे साथ रोते है


आदमी अकेला नहीं मरता, मरता है घर का एक एक जन थोड़ी थोड़ी सी मौत
और घर भर में टहलता रह जाता है दुःख
मगर दुःख और अंतहीन इंतजार के अंधियारे में हमें मिलता है एक रास्ता
एक आदमी के पसीने और रक्त से बना हुआ
और हमारे पांवो को पुकारती है उस रस्ते की धूल

Friday, June 10, 2011

ज़िन्दगी.......



जीवन का क्रम हमेशा चलता रहता है चाहे परिस्थितियां अनुकूल हो या प्रतिकूल हो . कभी तो एक लक्ष्य की दिशा में बिलकुल शांत, बिना बाधाओं के चलता रहता है और कभी इतना विषम हो जाता है की अपनी सारी शक्ति से संघर्ष करने पर भी, विषमताओं में उलझकर रह जाता है, लकिन फिर भी चलता रहता है. जीवन की विषम परिस्थियों का संघर्ष इंसान को मानसिक तौर पर कठोर तो बना देता है लकिन खुद को कठोर बनाने के संघर्ष में जो पीड़ा होती है वह अकथनीय है. हर चीज़ का केंद्र हमारा दिमाग ही नहीं बल्कि दिल भी होता है और इसीलिए मानसिक रूप से कठोर होने पर भी एक इंसान इंसानी भावनाओ से मरहूम नहीं हो सकता है.हालाकि प्रत्येक कठोर अनुभव चरित्र के किसी न किसी अंग की पुष्टि तो करता है लकिन कुछ अनुभव इतने कटु होते है की वो चरित्र के अंग की पुष्टि करने के बजाये आपको एक ऐसी जगह पर ले जाकर खड़ा कर देते है कि या तो आप ज़िन्दगी कि सच्चाई झुठलाकर जिंदा रहे या फिर इंसानी भावनाओ को मारकर जिंदा रहे. लेकिन ज़िन्दगी कि कुछ सच्चाइयां ऐसी होती है जिनको कितना भी झुठलाने कि कोशिश करें लेकिन झुठलाया ही नहीं जा सकता है क्योकि सच्चाई को तो समुन्दर में भी नहीं डूबोया जा सकता है .इसीलिए आपको ज़िन्दगी के कड़वे अनुभवों से सीख कर ,ज़िन्दगी कि वास्तविकताओं को स्वीकार कर मानसिक तौर पर कठोर हो कर ज़िन्दगी के विषम संग्राम को स्वीकार करना ही चाहिए.मैंने जो अपनी ज़िन्दगी के कड़वे अनुभवों से सीखा वो ये है कि असल चीज़ ज़िन्दगी नहीं हिम्मत, सब्र और प्यार कि शक्ति होती है जो इंसान को किसी भी परिस्थिति में जीने कि कला सीखा देते है . ज़िन्दगी तो मौत कि मुज़रिम है जो कभी भी गिरफ्तार हो सकती है और मौत से जयादा सच्ची हकीकत दुनिया में दूसरी नहीं है . जो जीवन का सुख भोगता है उसे एक न एक दिन जाना भी पड़ता है और मनुष्य कि इच्छाओं कि तो कोई सीमा ही नहीं है. हम जिन लोगो को दुनिया में सबसे अधिक प्रेम करते है उन्हें हमेशा अपने साथ देखना चाहते है ,लेकिन ऐसा होना संभव ही नहीं है . जो संसार में आया है उसे जाना भी पड़ता है.

ज़िन्दगी के ये कड़वे अनुभव ही हमें ये सोचने पर मजबूर कर देते है कि ज़िन्दगी आखिर है क्या? प्राण धारण कर बस किसी भी तरह जिंदा रहने कि जद्दोज़हद में जुट जाना और एक दिन उस जद्दोज़हद को छोड़कर प्राण त्याग देने को ही क्या ज़िन्दगी कहा जा सकता है? या ऊँची नीची राहों से चलकर एक ठीक से मुकाम तक पहुँच जाना ही ज़िन्दगी है? या फिर अनजानी गलियों से गुजरने का दर्द भरा सैलाब जिस अनचीहे और अनचाहे मुकाम तक ले जाता है ,वही ज़िन्दगी है. अगर ये नहीं है तो फिर आखिर क्या है ज़िन्दगी?

ज़िन्दगी कि विषम परिस्थितियों से ऊपर उठकर ,अपने आप को समाज कि तरक्की के संघर्ष के लिए समर्पित कर देना ही ज़िन्दगी है .ज़िन्दगी कि ये जो परिभाषा मैंने अपने दादाजी कि ज़िन्दगी से सीखी मुझे लगता है कि उसके अलावा ज़िन्दगी और कुछ हो ही नहीं सकती है जो ज़िन्दगी के आखिरी समय तक ये कहते रहे ''मैंने अपने जीवन क़ी हर सुबह को शाम होने के इंतजार में और हर शाम को सुबह होने के इंतजार में व्यर्थ नहीं गंवाया है .मै मनुष्य के जीवन को प्यार करता था और उसी के सोंदर्य के लिए ही मै संग्राम करने निकल पड़ा था . मै मनुष्य कि ख़ुशी के लिए जिया और उसी ख़ुशी को साथ ले कर जा रहा हूँ.